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Gita Shlok in Sanskrit | भगवद गीता के संस्कृत श्लोकों का हिन्दी में अर्थ

संस्कृत में भगवद गीता के श्लोकों (Gita Shlok in Sanskrit) को जानें और आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ जीवन की सच्चाइयों को समझें।

Gita Shlok in Sanskrit

भगवद गीता मात्र एक किताब नहीं है बल्कि ये एक अद्भुत ज्ञान का भंडार है। 

भगवद गीता (श्रीमद्भगवद्गीता) की रचना आज से 5000 साल पहले, महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने की।

महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन युद्ध करने से मना करते हैं तब श्री कृष्ण उन्हें उपदेश देते है और कर्म व धर्म के सच्चे ज्ञान से अवगत कराते हैं। श्री कृष्ण के इन्हीं उपदेशों को “भगवत गीता” नामक ग्रंथ में संकलित किया गया है। यह महाभारत के भीष्मपर्व का अंग है। इसमें श्लोकों या छंदों के रूप में भगवान कृष्ण की शिक्षा शामिल है जिसने अर्जुन के जीवन के दृष्टिकोण को बदल दिया।

ये हिंदू ग्रंथ संस्कृत भाषा में है जो श्लोकों के रूप में लिखा गया है। गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं।

हालाँकि गीता सदियों पुरानी है लेकिन इन पवित्र श्लोकों में निहित जो अद्भुत जानकारियाँ हैं, इसका ज्ञान और तर्क आज भी प्रासंगिक है, जो इसे एक कालजयी मार्गदर्शक बनाता है। इस आर्टिकल में हम इन्हीं पवित्र श्लोकों के बारे में जानेंगे जो आपको एक अद्भुत आध्यात्मिक मार्ग पर ले जाएँगे।

यहाँ पर इन 700 श्लोकों में से कुछ महत्वपूर्ण श्लोकों को हिन्दी में अर्थ (geeta ke shlok in sanskrit with hindi meaning) बताने वाले हैं।

इस लेख में, आपको भगवद गीता के कुछ सबसे महत्वपूर्ण श्लोक अर्थ सहित मिलेंगे। ये श्लोक या उद्धरण आपके लिए जीवन बदलने वाले साबित हो सकते हैं।

भगवद गीता के श्लोक हमें अपने जीवन में सही रास्ता खोजने और कठिन समय में सही विकल्प चुनने में मदद करते हैं। वे हमें आंतरिक शांति, उद्देश्य और जीवन में सच्ची सफलता पाने के लिए मार्गदर्शन करते हैं।

भगवद गीता के श्लोकों को समझने से हमें दैनिक जीवन के क्यों और कैसे के बारे में गहरी जानकारी मिलती है। भगवत गीता को नियमित रूप से पढ़ने से आप अपने जीवन और दृष्टिकोण में कुछ उल्लेखनीय बदलावों का अनुभव कर सकते हैं। आप अधिक शांत, प्रसन्न और अधिक संतुष्ट हो जायेंगे।

भगवद गीता की शिक्षाओं को समझने और वास्तविक जीवन में लागू करने के पर्याप्त लाभ हैं। यह वैदिक ज्ञान का सार है और आपको बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक स्तर पर विकसित होने में मदद करता है।

गीता ज्ञान – Gita Shlok in Sanskrit

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥47॥

कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही कर्म न करने में कभी अशक्त हो। हर मनुष्य के हाथ में कर्म करना तो है। पर कर्म का फल ले पाना मनुष्य के हाथ में नहीं है। इस लिए मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिए लेकिन फल की चिंता न करते हुए।

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

हे अर्जुन, ऋषियों और संतों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए, मैं सदियों से धरती पर पैदा हुआ हूं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं अपने स्वरूप की रचना करता हूँ।

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥11-6॥

न मैं यह शरीर हूँ और न यह शरीर मेरा है, मैं ज्ञानस्वरुप हूँ, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला जीवन मुक्ति को प्राप्त करता है। वह किये हुए (भूतकाल) और न किये हुए (भविष्य के) कर्मों का स्मरण नहीं करता है ।

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥5.15॥

सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥12.17॥

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है।

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌ ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥10.3॥

जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ।

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥8.3॥

परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है।

अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌ ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥8.5॥

जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

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यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥3.21॥

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु ‘लोक’ शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌ ॥3.14-15॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है ।

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥3.17॥

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।

आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥

संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है। वह न इच्छा करता है और न शोक ।

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते ॥

जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता हैूँ।

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥10.15॥

हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत्‌ के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं।

रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌ ॥10.23॥

मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ ।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ॥10.32॥

सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ।

भगवद गीता में संस्कृत का महत्व

संस्कृत का ऐतिहासिक संदर्भ

भगवद गीता के संस्कृत श्लोकों को जानने से पहले हमें संस्कृत के ऐतिहासिक महत्व को समझना होगा। प्राचीन भारत में लोकप्रिय यह भाषा आज भी लाखों लोगों के हृदय में एक पवित्र स्थान रखती है। संस्कृत दूसरी भाषाओं से अलग इसलिए भी हैं क्योंकि इससे न केवल अपने विचार व्यक्त किया जाता है बल्कि यह एक आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम है।

जब आप संस्कृत भाषा का अध्ययन करते हैं तो आप न केवल व्याकरण और फ़ोनेटिक्स सीखते हैं बल्कि आप इसके प्रत्येक अक्षरों की ध्वनि में मौजूद आध्यात्मिक ऊर्जा को भी महसूस करते हैं। इसी कारण संस्कृत को language of vibration भी कहा जाता है।

सही अर्थ की जानकारी

जब आप गीता श्लोकों को संस्कृत में पढ़ते हैं तो ये न केवल संस्कृत भाषा का अभ्यास नहीं है बल्कि श्लोक के हर शब्दों में मौजूद आध्यात्मिक रहस्य को जानने का प्रयास है। चाहे तो आप इन संस्कृत श्लोकों की जगह सीधे हिन्दी अनुवाद भी पढ़ सकते हैं लेकिन ये अनुवाद (चाहे जितना भी सटीक क्यों न हो) अक्सर शब्दों की गहराई और बारीकियों को नहीं पकड़ पाते। इसकी कारण आपको इन गीता श्लोकों को संस्कृत में पढ़ कर उनका सही अर्थ जानना चाहिए।

जीवन में गीता श्लोकों का महत्व

स्वयं को जान पाते हैं

मनुष्य अपने मन, शरीर, राष्ट्र, परिवार, मित्रों आदि से पहचान करता है। हमारे मूल्य और जीवन उद्देश्य इसी से आकार लेते हैं। दूसरी ओर, जब हम अपनी पहचान को भौतिक संपत्ति से जोड़ते हैं तो हमें बढ़ी हुई चिंता और भय का अनुभव होता है।

इस पर काबू पाने के लिए, भगवान कृष्ण बताते हैं कि हम जन्म और मृत्यु दोनों से रहित शाश्वत आत्माएं हैं। आत्मा आदि, अजन्मा और शाश्वत है।

जब शरीर मारा जाता है तो आत्मा नहीं मरती। जैसे-जैसे हम भगवद गीता के जीवन पाठों को पढ़ना जारी रखते हैं, हमें पता चलता है कि एक आत्मा को इस जीवनकाल के दौरान और उसके बाद भी कितनी यात्रा करनी होगी।

शांत रहना सीखते हैं

हमारा दिमाग हमेशा भटकता रहता है, ये अनावश्यक विचारों और अवांछित धारणाओं से भरा रहता है। ज़रूरत से ज़्यादा सोचने से हमें बेचैनी और अनिद्रा की बीमारी हो सकती है। भगवद गीता हमारी चिंताओं को शांत कर हमारी विचार प्रक्रियाओं का मार्गदर्शन करती है और हमें मानसिक संतुलन प्राप्त करने में मदद करती है।

जब भी आप चिंतित या उदास महसूस करें तो भगवद गीता से जीवन के सबक याद करें। ऐसा नहीं है कि ये आपकी बेवजह की चिंताओं को दूर करने के लिए कोई जादू है।

इसके पाठ हमें अपनी भावनाओं पर आत्म-नियंत्रण प्रदान करते हैं और हमें अच्छी और कठिन परिस्थितियों में आशावान बनाए रखने में हमारी मदद करते हैं। इसकी जीवन शिक्षाएँ हमें सिखाती हैं कि कैसे अपना नज़रिया / दृष्टिकोण विकसित करें, अपने विकल्पों को तौलें और अपने प्रयासों पर केंद्रित करें।

उज्ज्वल भविष्य की आशा करते हैं

कई समृद्ध व्यक्ति अपनी सफलताओं के लिए भगवद गीता के लेखन और पाठों को श्रेय देते हैं, जिसे उन्होंने यथाशीघ्र संस्कृत और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पढ़ा।

यह आपको कर्म पर ध्यान केंद्रित करने, अच्छी आदतें बनाने और उज्ज्वल भविष्य का लक्ष्य रखने के लिए प्रेरित करता है। इसके अलावा, जब हम अपने कठिन कार्य जीवन से तनाव में होते हैं तो इससे हमारे लिए चीजों को मैनेज करना आसान हो जाता है।

योग और ध्यान का अभ्यास कर सकते हैं

बहुत से लोग भगवद गीता श्लोक को धन्यवाद देते हैं – चाहे उन्होंने इसे संस्कृत में पढ़ा हो या किसी अन्य भाषा में – उन्हें स्वस्थ जीवन शैली जीने के लिए प्रेरित करने के लिए।

भगवान कृष्ण योग और ध्यान के मूल्य पर प्रकाश डालते हैं और चर्चा करते हैं कि वे सुख और आंतरिक शांति की हमारी खोज में कैसे सहायता करते हैं।

सच है, अब हम अपने विरोधियों से युद्ध के मैदान में नहीं लड़ते, लेकिन फिर भी हम हर समय मानसिक लड़ाई में लगे रहते हैं। यदि हम मानसिक रूप से शांत रहना चाहते हैं और अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहते हैं तो योग और ध्यान आदर्श अभ्यास हैं।

अपनी वास्तविक क्षमता को पहचान सकते हैं

बहुत से लोगों को ख़ुद पर संदेह होता है और वे भविष्य में कई चीज़ों को लेकर चिंतित रहते हैं। लेकिन अगर आप भगवद गीता के कथनों को पढ़ेंगे तो वो किसी मोटिवेशनल कोट्स से कम नहीं। ये कथन या कोट्स आपको अपनी क्षमता का एहसास कराते हैं और आपको अपने कर्म के लिए प्रेरित करते हैं।

इसके कथन/ श्लोक, ऊर्जा और आत्मा पर चर्चा करके जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण और हमारे विचारों को बदल देते हैं। हम स्वयं को अधिक ऊँचा समझने लगते हैं और एक नया दृष्टिकोण अपनाने लगते हैं।

आंतरिक शक्ति से जुड़ सकते हैं

प्रत्येक व्यक्ति में आंतरिक शक्ति होती है, जो उन्हें सबसे कठिन परिस्थितियों से भी निपटने में सक्षम बनाती है।

लेकिन, हम अपनी बेवजह की चिंताओं और व्यर्थ के डर के कारण उस शक्ति को नहीं पहचान पाते और उस तक नहीं पहुँच पाते हैं। जब अर्जुन इसी तरह की स्थिति का अनुभव करते है, तो भगवान कृष्ण उन्हें अपने भय और भ्रम का सामना करने और अपनी आंतरिक शक्ति की खोज करने की प्रेरणा देते हैं।

परिवर्तन की प्रकृति को समझ सकते हैं

एकमात्र चीज़ जो स्थायी है वह है परिवर्तन। हालाँकि यह कुछ ऐसा है जिसे हमने हमेशा सुना है, भगवद गीता इस विचार की सबसे गहन और व्यापक व्याख्या प्रदान करती है। हम किसी भी बदलाव को स्वीकार करने में झिझकते हैं, भले ही हम जानते हैं कि हमारे शरीर, भावनाओं, धारणाओं और भावनाओं सहित सब कुछ लगातार बदल रहा है।

हम परिवर्तन को अस्वीकार करते हैं क्योंकि हम इसके साथ सहज महसूस नहीं करते हैं। लेकिन अगर आप भगवद गीता के सबसे महान श्लोक पढ़ेंगे, तो आप देखेंगे कि सफलता के लिए लोगों को अपने परिवेश के साथ तालमेल बिठाने की आवश्यकता होती है। नए अनुभव प्राप्त करने के लिए, उन्हें रचनात्मक, जिज्ञासु, जोखिम लेने वाला, नवप्रवर्तक और अनुकूलक होने की आवश्यकता है।

ज़्यादा एकाग्र बनते हैं

भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार किसी भी लक्ष्य को पूरा करने के लिए पूर्ण एकाग्रता जरूरी है। एक परिभाषित उद्देश्य के बिना, हमारा ध्यान कई क्षेत्रों में विभाजित हो जाएगा, जिससे कार्यों को पूरा करना अधिक कठिन हो जाएगा। गीता के श्लोक आपको एकाग्र होने की प्रेरणा देते हैं।

कुछ भी स्थायी नहीं है ये जान पाते हैं

जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, चाहे वह सफलता हो या असफलता। दिन और रात की क्षणभंगुर प्रकृति, जो क्रमिक रूप से एक दूसरे का अनुसरण करती है, इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। इसलिए, अपनी पहली असफलताओं को अपने ऊपर हावी न होने दें।

अनुभव से आप जो ले सकते हैं, लें और तब तक हार न मानें जब तक आप सफल न हो जाएं। यही बात उन लोगों पर भी लागू होती है जो कठिनाई का सामना कर रहे हैं। उन्हें तब तक आगे बढ़ते रहना है जब तक कि अंततः वे जीत न हासिल कर लें।

सही संदर्भों को खोज पाते हैं

हर कोई अपने अनुभवों के आधार पर अलग-अलग तरीके से सीखता है। इससे हमारे विचार बनते हैं, जिससे हमें विश्वास होता है कि जो कोई भी हमसे अलग सोचता है वह गलत है और हमारा दृष्टिकोण सही है। भले ही हम किसी से असहमत हों, भगवद गीता हमें उनके विचारों और भावनाओं का सम्मान करने के लिए प्रोत्साहित करती है।

महाभारत युद्ध की शुरुआत के साथ, अर्जुन खोया हुआ और भ्रमित महसूस करने लगते हैं। वे लड़ने से इनकार करते हैं क्योंकि वे नहीं देख पा रहे थे कि उनके कार्यों का क्या परिणाम होगा। भगवान कृष्ण की सहायता से, अर्जुन, चीजों को स्पष्ट रूप से देख पाते हैं और जान पाते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए।

कई महत्वपूर्ण भगवद गीता श्लोक हमें स्पष्ट करते हैं कि कौन से कार्य आवश्यक हैं और क्यों, साथ ही विभिन्न परिस्थितियों में हमारे कार्य और वे हमारी मानसिकता को कैसे प्रभावित करते हैं।

भविष्य की अनिश्चितताओं से उपजी चिंताओं पर नियंत्रण कर पाते हैं

हर किसी को चिंताएँ होती हैं, चाहे वे अपने परिवार, वित्त, करियर या शिक्षा से संबंधित हों। हममें से अधिकांश लोग समाधान खोजने की आशा में लगातार उन पर विचार करते हैं, लेकिन कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भगवद गीता में सार्थक श्लोकों का अध्ययन करके, आप अपने मन को शांत करना और इन निराधार चिंताओं को कम करना सीख सकते हैं। आप निष्पक्षता और कर्म के बारे में सीखते हैं, साथ ही जो सही है उसके लिए बोलने का साहस भी प्राप्त करते हैं।

निडर होना सीखते हैं

मनुष्य के लिए डर अपरिहार्य है। इसका परिणाम अज्ञानता, भावनात्मक अस्थिरता या असुरक्षा हो सकता है। लेकिन भगवद गीता को पढ़कर, आप सीख सकते हैं और समझदार बन सकते हैं, जो आपको अपनी सबसे बड़ी चिंताओं का सामना कैसे करना है।

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Written by Yogendra Rai

अक्सर लोग, होम एप्लायंस को ख़रीदकर इस्तेमाल करते हैं लेकिन मैं इनका इस्तेमाल एक अलग नज़रिए से करता हूँ। ऐसा इसलिए ताकि मैं इनके फ़ीचर्स या खूबियों को परख सकूँ, इनकी ख़ामियों को जान सकूँ।फिर इन सभी जानकारियों को इकट्ठा करके आपके सामने इन्हें पेश कर करता हूँ, ताकि आप इन होम एप्लायंस को ख़रीदने के पहले इनके बारे में अच्छी तरह से जान सकें और अपने बजट / ज़रूरतों के अनुसार सही प्रोडक्ट को ख़रीद सकें।

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